| كـمـى بـذر گـل گـنـدم بـكاريـم |
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بـراى كـفـتـران سـبـز مـشـهد |
| بـنـوشـيـم آب صـاف مـهربـانى |
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شـبـيـه هـشـتـمين شعر (محمـد) |
| اگـر چـه گـنبـدش دور است از ما |
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ولـى راه نـگـاهـش باز بـاز است |
| دواى زخـم بـال كـفـتــرانــش |
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دو ركعت عشق و يك قطره نماز است |
| خـداى آرزوهـايـم كـمـــك كـن |
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حـرم را تـوى خـواب خـوش ببينم |
| ضـريـح آشـنـايـش را بـبـوسـم |
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گـل صـحـن نـگـاهـش را بـچينم |
| كـمـك كـن كـفـتـرى بر شانه هايم |
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بـسـازد لانـه اى از مـهـربـانـى |
| كـمـك كـن تـا دعـايـم سـبز باشد |
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بـسـازم يـك ضـريـح آسـمـانـى |
| كـمـك كـن مـثـل مشهد، شهر رؤيا |
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دلـم پـر ازدحـام از نـور بـاشــد |
| پـر از پـرواز كـفـتـرهـاى كوچك |
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سـرم سـبـز و دلـم پـر شور باشد |
| كـمـك كـن ضـامـن آهـوى قـلبم |
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بـه رنـگ يـك دعـا در مـن بجوشد |
| خــداى آرزوهــايــم كـمـك كن |
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كـه يـك كـفـتـر دعـايـم را بنوشد |